दूसरी परंपरा story collection

 

dusari parampra

                                                            दूसरी परंपरा

 




काली रात , हर ओर सांय-सांय, बादलों की तड़क-गरज भी नहीं, कुछ भी दिख नहीं रहा, भयानक अंधेरा-अंधेरा भी बोलता, बतियाता, गुदगुदाता, अब उसे अंधेरे की गुदगुदियों से कुछ लेना-देना नहीं, पहले की बात दूसरी थी........वे पढ़ाई के दिन थे, पिता जीवित थे, घर पहुंचते ही पिता के सवाल उसकी खोपड़ी झनझना देते थे,

इतनी रात तक कहां थे? पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे रहे?’

पहले तो नहीं, पर बाद में उसे विश्वसनीय झूठ बोलने की आदत पड़ गई थी, बाद में पिता ने तो पूछना ही बंद कर दिया था... शायद वे समझने लगे थे कि कुछ- कुछ इतर है, उसके बाद तो उसे पिता या मां को कुछ भी बताना पड़ता कि अंधेरे की भाषा को झूठ की लिपि पहनाने की कला सीख रहा है, अब तो उसे विशेषज्ञता भी हासिल हो चुकी है...

उसे लगता कि सारी गुदगुदियां अंधेरे की भाषा में कैद हैं... वह वही दौर था जब उसे हर ओर हंसियां ही हंसियां दिखतीं.... खूबसूरत आंखे, पांव, पतले-पतले होठ , पतली कमर का लहराना, दिखता फिर तो उसे लगता कि यह अंधेरे की भाषा है जिससे सारी चीजें चमकदार दिखती हैं,

चमकदार चीजें उसे इतना प्रभावित करतीं कि उसे उजाले से घिन होने लगी थी,

अचानक नहीं हुआ ऐसा कि उसे अब अंधेरे की भाषा उसकी गुदगुदियों में कोई रूचि नहीं जबकि वह दिखावटी ही सही रामरामी, गायत्री या वेदों वाला कोई संत नहीं.... सन्तई उसके प्रबोधनों से उसका दूर का भी नाता नहीं.....

वैसे आज भी जरूरी कामों को उसे अंधेरे में ही निपटाना पड़ता है, अंधेरे से बोलना बतियाना होता है पर उसमें गुदगुदियां नहीं, लक्ष्य होता है, बलिदानी उर्जा होती है, उन कामों को उजाले मेें करते समय अप्रत्याशित , बाधाओं, उलझाओं का उसे डर बना रहता है, उसका मानना है कि काम तो काम होता है, काम के समय गुदगुदियों से यदि परहेज नहीं किया गया फिर तो लक्ष्य में भटकाव आना असम्भव नहीं, अब तो उसे पहले वाली गुदगुदियां अंधेरे की भाषा में नहीं दिखतीं....

वही अंधेरा, वही सांय-सांय गुदगुदियों वाला मौका पर अब वैसा नहीं, किसी भी तरह का डर भी नहीं, पहले अंधेरा उसे पीता था पर अब उसे वह पीता है, लेकिन आज वह डर रहा है, उसे आज यह डर क्यों आक्रांत कर रहा है, कुछ भी स्पष्ट नहीं,

डरते हुए ही उसे महसूस हुआ कि उसके पास वाले मोटे-मोटे दरखत दिखने लगे हैं पर साफ-साफ नहीं कि वे पहचाने जा सकें, उसे लगा कि दरख्त भी डरे हुए हैं तथा भयानक चुप्पी में हैं, तभी उसकी कमर में तथा पीठ में तेज दर्द उभरा... वह रस्से का यातनादायी बधाव था, एकदम से कसा हुआ, हिल भी सको,

बांधे जाते समय ही नहीं उसे पहले से ही गुमान था कि वह पेड़ की तरह सख्त स्थिर है, पेड़ जैसा ही सालों साल खड़ा रह सकता है, पेड़ों की जड़ों की तरह उसकी जड़े भी काफी गहरे तक धंसी हैं, कोई दुलारे , खिलाए या नहीं फिर भी उससे उसका लहराना, झूमना नहीं छीना जा सकता ,

उसे याद है पहले की बात जब उसने कामरेड मौर्या से कहा था , ‘कामरेड कोई मेरी चमड़ी उतार ले फिर भी नहीं बताऊंगा कि मैं कौन हूं, क्योंकि मैं अच्छी तरह जानता हूं कि मेरे होने का मतलब क्या है........’

कामरेड मौर्या किसी मुर्झाए फूल की हंसी हंस दिए थे, उस वक्त मौर्या का हंसना उसे अच्छा नहीं लगा था, पर आज, पेड़ों की तरह लहराना झूमना आखिर क्या है कि सारा कुछ छिना जा रहा है, वह डर क्यों रहा है ? क्या उसे नहीं मालूम कि मृत्यु को विज्ञान या कोई विचार स्थगित नहीं कर सकता, कहीं..... पागल तो नहीं हो गया ?

नहीं ऐसा नहीं , उसे पागलपन कभी नहीं जकड़ सकता, उसने मन की चंचलता को दृढ़ किया तथा स्नेहिल आत्मीयता से जंगल के बारे में सोचा, उसे मालूम था कि वह जंगल में है, उसी जंगल में जिसके दरख्तों, झाड़ियों,नालों पठारों से उसकी मर्मभरी गुफ्तगू होती रही है, अंतरंगता इतनी कि उसे झाड़ियों तक से वह सब बताना पड़ता था जो सामान्यतया छिपाव की बातें होती हैं पर उसे कटे हुए खुत्थों को देखकर अनामंत्रित गुस्सा जाता है, उसकी मुट्ठियां कस जाती हैं.....

कितने हरामजादे हैं लोग जो दरख्तों तक का कत्ल करते हैं, उनकी आंतों में से कुर्सियां पलंग, टेबुल जैसी किसम किसम की बस्तुएं निकालते हैं....

उसके इस जंगल में होने के बाद से ही तो यह खेल स्थगित है... वरना अब तक तो सूरज यहां के चप्पे-चप्पे पर काबिज होकर जंगल का सारा हरापन सोख चुका होता, पहाड़ियों को छेद कर उसकी दृढ़ता को लुजलुज बना चुका होता....

बंधे हुए ही उसने थोड़ा झुकने की कोशिश की कि जानकारी ले सके, पांवों के पास होने वाली सरसराहट आखिर क्यों है, पर झुक पाना उसके लिए आसान या संभव ही नहीं था, उसे मजबूती से जकड़ा गया था, हाथों को पहले ही बांध दिया गया था, अब उसकी स्थिति उसी पेड़ जैसी थी जिससे उसे बांधा गया था, पेड़ हिलता तभी उसमें हरकत होती,

थोड़ा झुकने की कोशिश में उसे दर्द का आभास हुआ लगा कि पीठ दो फांकों में चीरी जा रही है, फिर तो सरसराहट उसके मन से कहीं निकल गई, पर ऐसा नहीं था,सरसराहट जारी थी, जो पांवों ,घुटनों से होते हुए सिर तक जा चुकी थी तभी अचानक सरसराहट नीचे उतरी, पांवों पर आकर स्थिर हो गई....

उसने पैरों को झटका दिया, भद्द जैसी गिरने की आवाज हुई, जैसे कोई मुलायम चीज गिरी हो, वह सांप भी हो सकता था, या गिरगिटान, नेवला, गिलहरी, चूहा, मेढ़क, कुछ भी, उसने अनुमान लगाया फिर विश्लेषित करने लगा कि सांप होता तो उसका ठंडापन पांव पीते, नेवला होता तो उसके पंजे गड़ते, इसी तरह जाने कितने जीव जंतुओं के बारे में किसी जीव विज्ञानी की तरह उसने सोचा, तभी उसे महसूस हुआ कि उसके पांवों पर फिर से सरसराहट होने लगी है....

इस सरसराहट ने उसे डरा दिया पर प्रतिकार स्वरूप कुछ कर सकने की क्षमता उसमें थी, उसने दुबारा पांव झटकना चाहा पर, सरसराहट थी कि उसके पेट को नापते, मुंह नाक को सहलाते ऊपर चढ़ चुकी थी फिर अचानक गायब , उसने अनुमान किया कि कोई जन्तु या कीड़ा रहा होगा, पेड़ पर चढ़कर मौज लेने वाला,

हालांकि उसे अनुमान तक हो सका कि चढ़ने वाला क्या था, किस प्रजाति का था पर उसके चढ़ने से उसे जिस तरह की गुदगुदी का आभास हुआ उस पर उसे हंसी गई.... क्योंकि गुदगुदी पहले की तरह थी... दिल सहलाने वाली, कानों में श्रृंगार घोलने वाली , उसे खुद पर ताज्जुब हुआ, आखिर उसे अंधेरे की भाषा भूलने के लिए कितना समय चाहिए....

एक ऐसे समय में जबकि उसे बधस्थल पर बांधा जा चुका है बध करने के लिए.... शांति व्यवस्था पर बलि चढ़ाने के लिए फिर भी उसे गुदगुदियों में गोता लगाने की सूझ रही है, उसने खुद को लताड़ा....

अब उसे अपना बंधना महसूस हुआ..... ‘पेड़ से बंधे हुए दो घंटे तो गुजर ही गए होगें, आखिर क्यों देरी कर रहे हैं सब?’ उसे गोली मारनेवालों पर, उनकी लेट-लतीफी लापरवाही पर घृणा हुई, उसने उन्हें भद्दी सी गाली दीसाले तनख्वाह लेंगे मोटी, सुविधा राजा महाराजाओं की तरह और काम, बाकी कामों में तो वे गैर जिम्मेदारी बरतते ही हैं, गोली मारने में भी देरी करते हें... छिः लानत है, उसने गर्दन घुमाया तथा पिच्च से थूक दिया जैसे घृणा से उसके मुंह में खंखार गया हो तथा सांस लेने में दिक्कत हो रही हो, जब उसे पकड़ा गया था तभी उसने निश्चित कर लिया था कि उसे गोली मारी जायगी, काउन्टर साहब यहीं होगा कहीं आसपास, उसे कोतवाल बनना है, आखिर किसे तरक्की पसंद नहीं ?

तरक्की भी वाह! क्या चीज हैतभी तो सुधेसर ने ऐसा करवाया , नही ंतो उसे कौन पकड़ पाता, किसी को क्या पता कि मैं कहां हूं, कहां आता-जाता हूं, कामरेड़ मौर्या भी तो नहीं जानते.... सुधेसर का सोचना है कि संगठन में सवर्णों की भर्ती नहीं होनी चाहिए.... फिर यह ठाकुर तो संगठन का आला अगुआ है, इसके रहते उसकी तरक्की नहीं हो पाएगी....

उसे सुधेसर का चेहरा दिखा....लाल-लाल खूनी चकत्तों वाला .... उसे चिंता हुई.... आखिर जाति से मुक्त होने के लिए क्या रास्ते हैं उसके पास ... अक्ल हो तो कोई देख ले उसका काम , आज किसी भी ठाकुर की गर्दन आसमान की ओर तनती नहीं, सभी की आंखे जमीन की तरफ... जान बचाने का रास्ता तलाशती , आखिर यह किसे नहीं मालुम कि सिर का नाता यदि धड़ से बनाए रखना है फिर तो जमीन की तरफ ही देखना होगा तथा माथा पांवों से चिपकाना होगा दूसरों के नहीं अपने पांवों से , सुधेसर के लिए आसान था उसे पकड़वाना तथा मानकर चलना कि काउंटर साहब गोली ही मारेगा फिर तो उसने किसी ठाकुर की मद्द लेकर पुलिस को अवगत कर दिया होगा, नहीं तो पुलिस झोकहवा नाले तक क्यों आती ?

किसी भी हाल में उसे साल में एक बार, निश्चित तिथि पर यानी ठीक सत्रह जुलाई को झोकहवा नाले के पास वाली पहाड़ी पर जाना ही है.... पूरी रात के लिए जहां सत्तो की मुठभेड़ में हत्या की गई थी... सुधेसर भाग लिया था पर सत्तो डटी रह गई थी, रायफल की अंतिम गोली तक, सत्तो सुधेसर के जाति की थी पर थी जाति से बाहर, वह स्त्री होने से भी बाहर थी, कायदा-कानूनों के कष्टदायी लदावों से घृणा करने वाली, वह सिर्फ मनुष्य बनकर रहना चाहती थी, कायदा-कानून , या किसी अप्राकृतिक चीज का उपकरण नहीं.....

सुधेसर सत्तो से चिढ़ता था कि वह उसे क्यों नहीं सहलाती ? किसी ठाकुर के साथ क्यों है? लेकिन यह सब सोचना उसे मजाक जैसा लगा क्या होगा सोचकर ? घंटे दो घंटे में ही काउंटर साहब उसे गोली मार देगा फिर वह प्रकृति में घुल जाएगा लेकिन तभी उसे झटका जैसा लगा, जैसे उसके जिस्म का सारा खून चूस लिया गया हो,

कहीं बैजू की तरह उसे भी यातनागृह में डाल दिया गया तो!’

यह डर तो उसे पहले भी था, हो सकता है यातनागृह में डाल दे फिर सिगरेटों बिजली के करंेट से देह निचोड़ना शुरू करे लेकिन जब उसे थाना तक नहीं ले जाया गया, जंगल में ही पेड़ से बांध दिया गया फिर तो उसके मन से डर जैसी चीज फुर्र हो गई थी....

शायद ऐसा नहीं हैगोली मारना होता तो मार दिया होता, उसी समय जब उसे पकड़ा गया था, जब वह झोकहवा नाले के पास वाली पहाड़ी पर बैठकर सत्तो की स्मृतियों से छेड़-छाड़ कर रहा था और सत्तो उसकी आंखों में उन्मुक्त गोता लगा रही थी, हूबहू वही, रूप वही रंग वही, चाल वहीउसने उस समय अपनी रायफल चट्टान पर रख दिया था तथा जहां बैठता था सत्तों में डूबने के लिए बैठ गया था तभी उसकी पकड़ हो गई,

पकड़ तो होनी ही थी , उसका हाथ पैर मारकर प्रतिकार करना बेकार गया, दो चट्टानों की दरारों में से उगी हुई पत्थर चट्टा घास भी उस समय इतनी मुलायम हो गई थी कि रौंदा गई थी, उसे पत्थर चट्टा तथा सत्

की सख्ती में कभी फर्क समझ में नहीं आया पर सत्तो पत्थर चट्टा के अलावा भी बहुत कुछ थी उसके लिए,

पेड़ से बंधा होना उसे काफी कष्टदायी लगने लगा, अचानक उसने भाग्य को कोसा , हालांकि वह भाग्यवादी नहीं था फिर भी .... उसे सत्तो याद आने लगी थी कि पहली गोली में ही उसकी मुलाकात सत्तो से हो जाएगी क्योंकि पुलिस वाले बंधे हुए आदमी को गोली मारने में असावधानी नहीं करते, ठीक-ठीक खोपड़ी में मारते हैं... पर ऐसा हो कहां रहा था ... पुलिस वालों की वहां गंध तक थी....

विगत के उतार-चढ़ाव के दौरान ही उसे आहट लगी कि बूटों की आवाज उसकी तरफ रही है....... उसने अपना ध्यान उस तरफ मोड़ दिया... उसे समझ में आया कि कोई अकेला रहा है, पुलिस अकेली तो होती नहीं....

वास्तव में आने वाला अकेला ही था जो जमीन दबाते हुए रहा था हालांकि आने वाला दिखने में बाहर था...झिलमिल जैसा.... उसने आंखों पर दबाब बनाया कि आने वाला साफ-साफ दिखे... कुछ देर बाद दबाब की आवश्यकता थी.....आने वाले की गंध ही ऐसी थी कि उसने अनुमान पक्का कर लिया,‘पुलिस वाला है’,

आने वाला पुलिस वाला ही था हुक्मरानी गंध में सरोबार, हाथ में रायफल लिए, कड़क चाल, आने वाला इतना पास गया कि उसने पहचान लियाकाउंटर साहब’,

उसे इतनी खुशी हुई कि उसके मन मस्तिष्क से डर जैसी बेबुनियाद चीज फुर्र हो गई, अंधेरे की बदली हुई भाषा उसके अनुकूल लगने लगी.....

काउंटर साहब कुछ ही क्षण में उसके सामने था..... उसने तनेन होकर उससे पूछा..

तो तुम कुछ नहीं बताओगे, यहां तक कि अपना नाम भी’,

मैं बताना जरूरी नहीं समझता... उसने बताया,

तुम्हें मालूम होना चाहिए कि तुम बन्दी हो, तुम अपराधी ही नहीं आतंकवादी भी हो और तुम्हारी सजा... काउंटर साहब बोलते-बोलते रूक गया, जैसे जो कह रहा है, वह नहीं कहना चाहिए....

उसने काउंटर साहब की बात का सिरा जोड़ा...

मौत, फांसी या गोली, यही ... तुम्हारे जैसे डरपोक गोली नहीं मारा करते’,

अच्छा! मैं डरपोक हूंकहकर काउंटर साहब ने रायफल की नाल उसकी खोपड़ी पर टिका दिया... फिर पहले वाला सवाल दुहराया,

तो तुम अब भी कुछ नहीं बताओगे,’

अब भी नहीं, कभी भी कुछ नहीं?’ उसने सगर्व बताया,

देखता हूं कितना दम है?’ काउंटर साहब ने राइफल की नाल उसकी खोपड़ी मंे धसांया ... उसे दर्द हुआ वैसे भी रस्से का बंधन उसे काफी तकलीफ दे रहा था, काउन्टर साहब ने नाल थोड़ा जोर से सटाकर उसे धमकाया....

खोपड़ी उधरा जाएगीथोड़ी मासूमियत से सरकारी गवाह बनाने की तर्ज पर काउंटर साहब ने उसे फिर फुसलाना चाहा...

आखिर बता क्यों नहीं देते संगठन के बारे में ... मैं वादा करता हूं तुम्हें कुछ नहीं होगा ... दो चार साल जेल में रहने के बाद बाहर जाओगे... तब तक तो तुम इतने प्रचारित चर्चित हो चुके रहोगे कि किसी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़कर कम से कम विधायक तो बन ही जाओगे..’.

अच्छा! उसे हंसी गई, उसने मजाक किया...

तो तुम गोशाले में बंधने की सलाह दे रहे हो?’ आखिर तुम मुझमें किस स्वार्थ के कारण रूचि ले रहे हो... अगर कुछ जानना चाहते हो तो सुनो... वैसे तुम्हारा सवाल काफी बेहूदा है... मैं तो तुम्हारी पुलिस के बारे में नहीं पूछ रहा...

फिर भी तुम्हें बता दूं पर तुम्हें यकीन नहीं होगा, मेरे संगठन के बारे में जितना तुम या तुम्हारी पुलिस जानती है उतना भी मुझे नहीं मालूम, चाहूं भी तो नहीं जान सकता- आंध्र से लेकर यहां तक , तुम्हारे थाने से लेकर तुम्हारे गांव घर तक... कहां नहीं है संगठन... अब ऐसे में भला मैं क्या बताऊं ?’

तो तुम नहीं बताओगे... कोई भी अपराधी अपने बारे में नहीं बताता..’ काउन्टर साहब खीझ उठा... तथा उसे अपराधी संबोधित करने पर गुस्सा गया... उसने साफ-साफ पूछा...

कौन है अपराधी ? मैं या तुम .... तो सुन लो मैं अपराधी नहीं, अपराधी तुम और तुम्हारे जैसे लोग हैं जो बेमतलब का कानूनी शर्बत हर उस आदमी को पिलाते है जिसकी भूख तथा गरीबी कोई कानून नहीं मिटा सका.....?’

काउंटर साहब ने उसकी खोपड़ी पर से नाल हटा लिया तथा एक ही हाथ से रायफल हवा में लहराया.... फिर धांय... जंगल की प्रति ध्वनि गूंजी, काउंटर साहब ख्यात कुख्यात के बीच का इन्सान था, अक्सर लोगों के एनकाउंटर ही करता था, एनकाउंटर के लिए वह पल्ले से रूपया खर्चता , अपराधिक इतिहास वालों का पता करता... जंगल के किसी पेड़ से बंधवाकर गोली मरवा देता... फिर ईनाम लेता, अखबारों में मुठभेड़ की खबर छपती... पुलिस के उच्चाधिकारी इस तरह के उत्तर आधुनिक मुठभेड़ पर सीना फुलाते तथा एनजीओ वाले सबाल्टर्न कहानी गढ़कर फंड जोगाड़ लेते,

साला गोली नहीं मारेगाउसे कामरेड बैजू का ख्याल दुबारा आया, फिर तो उसे आंतरिक कंपकंपी रोकना था क्योंकि काउन्टर साहब सामने था, वह मजाक उड़ाता... उसने खुद को संयत किया फिर दृढ़ होकर बोलना शुरू किया... लगभग आदेशात्मक शैली में-

नाल अपनी तरफ कर लो, उसकी मर्यादा होती है, तुम्हारे जैसा हत्यारा इसे नहीं समझेगा, तूने एक गोली बेमतलब हवा में उड़ा दिया, मालूम है जंगल इस समय गहरी नींद में है, सारे पेड़ दिनभर की थकान मिटाने में हैं, ऊपर देखो पत्ते कांप रहे हैं, पतली सी डार पेड़ से अलग होकर अभी गिरी है, बांई ओर से हटकर थोड़ा दाहिने घूमो... पेड़ों की जड़ के पास कान लगाकर सुनो, तुम्हें कराह सुनाई देगी...

लेकिन पेड़ों से संवाद करना तो तुम्हें पढ़ाया नहीं गया, जंगल का अनुशासन तुम सीखना नहीं चाहोगे, पेड़ों को थोड़ा सहलाओ, फिर देखो तो वहां तुम्हारी मूर्खताओं के काले धब्बे दिखेंगे, खैर तुमसे उम्मीद करना कि प्रकृति का न्याय जो प्रकृति की भाषा में है, उसे तुम पढ़ोगे बेवकूफी होगी....

वैसे बेवकूफी तो यह भी है कि मैं तुमसे बातें कर रहा हूं, जल्दी करो, अपना काम निपटाओ तथा गोली मारो जिसके लिए मोटी तनख्वाह डकारते हो.....?

काउन्टर सहाब उसे देखने में लगातार था, उसने रायफल सीधी कर लिया, कहीं से अचरज का एक अनगढ़ टुकड़ा आया तथा उसके चेहरे पर चिपक गया...

बातें इन्ट्रेस्टिंग करते हो, पढ़े-लिखे जान पड़ते हो , वैसे तुम्हारे जैसा अब तक कोई नहीं मिला,’ काउन्टर साहब ने तर्क प्रति तर्क को आगे बढ़ाया जैसे काफी फुर्सत में हो तथा पुलसिया काम को खेल समझता हो, उसने कुछ सोचकर कहा... जो पूछने जैसा था ......

गोया तुम दार्शनिक हो...

तुम मुझे गाली दे रहे हो... उसने फटाका काउन्टर साहब को रोका...

दार्शनिक कहना गाली देना है क्या ? लगता है गलियों को तुम नीतिशतक का हिस्सा मानते हो.... काउन्टर साहब ने उसके ऊपर व्यंग्य फेका....

आखिर तुम देर क्यों कर रहे हो ? क्यों नहीं मारते गोली, उसने झुंझलाकर पूछा... वस्तुतः उसे घबराहट होने लगी थी, कुछ कुछ गड़बड़ अवश्य है,

तो क्या तुम मुंह नहीं खोलोगे ?’ काउन्टर साहब ने पूछा...

कभी नहीं, क्योंकि यह तुम्हारी चिंता है मेरी नहीं कि तुम मेरा उपयोग कैसे करोगे... गोली मारोगे या यातनागृह में डालकर जबरिया कहलवाओगे कि मैं अपराधी हूं, वगैरह-वगैरह... इस तरह का घटिया काम तुम्हारे जैसे लोग ही किया करते हैं’,

काउन्टर साहब हंसने लगा... हंसते हुए ही उसने अपना पक्ष रखा....

इस समय कोई बेवकूफ ही तुम्हें गोली मारेगा, वैसे भी तुम्हारी काबिलियत किसी को भी गोली मारने से रोक देगी, जरा सोचो तो...’ थोड़ा रूककर काउन्टर साहब बोला.....

इस समय तुम रस्से से बंधे हो, भयानक जंगल में, हर ओर सांय-सांय, फिल्मी दृश्य जैसा...हूबहू वैसा ही... दृश्य....फिल्म का खलनायक हीरो को बंधवा देता है फिर गोली मारने का उपक्रम करता है, दर्शक समझते हैं कि गोली चलेगी पर चलती नहीं, नाटकीय ढंग से कुछ लोग आते हैं तथा हीरो को छुड़ा ले जाते हैं... लेकिन तुम छुड़ाए नहीं जा सकोगे, पूरा बार्डर सील है... ऐसे में कुछ नहीं हो सकता... मैं तुम्हें आखिरी मौका देता हूं साफ-साफ बता दो...’ कहकर काउंटर साहब ने रायफल की मैगजीन देखा उसमें एक कारतूस और लोड किया...

उसने काउन्टर साहब को आवेशित करने की गरज से टोका...

तुम कायर हो मिस्टर एनकाउंटर , गोली मारना तुम्हारे वश का नहीं, साथ ही साथ तुम मूर्ख भी हो , यदि तुम समझते हो कि यातनागृह में मैं अपने होने के बारे में बता दूंगा तो यह तुम्हारी बेवकूफी होगी... कहो तो अपना चमड़ा उतार कर दिखाऊं.....’

अच्छा! ऐसा कर सकते होकाउंटर साहब ने उसे कसा....

फिर उसने काउंटर साहब से कहा... जहां चाहो छील दो, या कील ठोंको, उफ्फ तक करूंगा... काउंटर साहब ने वैसा किया भी पर उसने सी तक नहीं किया... यह देखकर काउंटर साहब चकरा गया...एक बार तो उसके मन में आया कि गोली मार दे पर उसने यह विचार समाप्त कर दिया....

आखिरी बार काउंटर साहब से उसने कहा...

साफ-साफ बताओ... क्या अब भी गोली नहीं मारोगे, सुबह होने वाली है...आसमान साफ होने पर गोली मारोगे तो जंगल तुम पर थूकेगा, पेड़ गालिया दंेगे...समझे...

सही सही जानना चाहते हो तो जान लो, मैं तुम्हें गोली नहीं मारूंगा... तुम्हारे जैसों को गोली मारना मूर्खता होती है, तुम तो यातनागृह में सड़ने के काबिल हो... जब तुम्हें देखा नहीं था तो निश्चित था कि गोली मारूंगा, तुम्हारी पकड़ के समय मैं था भी नहीं... तुम्हें यहीं देखा, पहली बार देखते ही मुझे महसूस हुआ कि तम्हारी आंखों में तुम्हारे विचार क्या कहोगे आइडियोलाजी... हां-हां वही तैर रहे थे, तुम्हारे चेहरे पर उसकी दृढ़ता थी तथा बलिदान होने की अप्रतिम चाहना भी ... जबकि सिपाहियों ने बताया था कि पकड़ के समय तुम डरे हुए थे...शायद बांधे जाने के समय भी...

काउंटर साहब ठीक उसके सामने था, तथा उसकी आंखें प्रशासनिक नीतियों की तरह ऊपर नीचे हो रही थीं, सहज ही अनुमान किया जा सकता था कि उसमें धोखे तैर रहे हैं, उसने डर के बारे में सफाई देना ठीक समझा तथा काउंटर साहब से बोला...

मिस्टर काउंटर , यानी कि दरोगा जी, हालांकि तुम एक संवेदनहीन आदमी नहीं हो फिर भी मैं तुम्हंे बताऊं कि मुझे यातनगृहों से काफी डर लगती है, क्योंकि योगियों जैसे देह साधक भी करेंटों, बेंत की मारों, चूतड़ पर गर्म पानी (खौलता हुआ) का छिड़काव, फिर हाथों, पावों के नाखूनों का खिंचाव नहीं सह सकता, वह चीख पड़ेगा... मनुष्य होने की प्राकृतिक कमजोरी उसके साथ बनी रहेगी...’

सो मैं बांधे जाते समय डर रहा था, अब भी डर रहा हूं क्योंकि तुम पुलिस वाले हो, क्या मालूम कि कब क्या करोगे ?

काउंटर साहब गंभीर होकर उसे सुन रहा था, उसने थोड़ा रूककर काउंटर साहब से पूछा...

मिस्टर काउंटर! मैं समझता था कि तुम धोखेबाज नहीं हो, पर तुम धोखे बाज निकले, मुझे धोखे से पकड़वा लिया...

धोखा नहीं कार्य योजना बोलो कामरेड, यह इक्कीसवीं सदी है सारा कुछ वर्क प्लान से किया जाता है, तुम्हारी गिरफ्तारीआपरेशन कैटका हिस्सा है, समझे.’ काउन्टर साहब ने खुलासा किया, उसने काउंटर सहाब के खुलासे पर प्रहार किया...

बकवास ! यह सरासर झूठ है मि0 काउंटर... आपरेशन कैट...वाह! क्या नाम है,

तुम बाघ हो क्या ? गीदड़ की तरह भागने वाला, मुठभेड़ों से डरने वाला... मैं समझ सकता हूं तुम्हारी मजबूरियां... तुम नौकरी करते हो, जो गुलामी का ही एक रूप है... आखिरी बार तुमसे पूछता हूं...’

क्या तुम सही में गोली नहीं मारेगे ?’

काउंटर साहब को हंसी गई, वह खूब हंसा, उसकी हंसी में उसे भी घुलना होता पर वह गंभीर था, तथा यातनागृह में जाने की मानसिक तैयारी में था... उसे यातनागृह का उद्धरण बनना है... तभी काउंटर साहब ने साफ बताया...

क्षमा करना कामरेड! मैं तुम्हें गोली नहीं मारूंगा... क्योंकि मैं जानता हूं तुम्हारे जैसे आइडियोलाजी वाले लोग गोली लगते ही जीवित हो जाते हैं, एक दो नहीं जाने कितने...तुम्हें मौका है यातनागृह में (तुम्हारे शब्दों में) चलने का मन बना लो..’

उसे काउंटर साहब पर गुस्सा आया जिसका कुछ मतलब था क्यों कि उसके हाथ बंधे थे... उसने काउंटर साहब से पूछा, जो निवेदन था...

क्या तुम मेरा एक हाथ खोल सकते हो ?’

नहीं,’ उसका उपयोग जाने क्या करो... काउंटर साहब बोला,

अब उसे पक्का यकीन हो चुका था कि उसे यातनागृह तक जाना ही होगा... उसने सवालों को नाजुक बनाते हुए काउंटर साहब से पूछा...

तुम चालीस के आसपास हो...साठ के बाद क्या करोगे ? तब तो बिल्ला तथा वर्दी नहीं रहेगी... तुम्हारे अधिकार जो गिरफ्तारी हत्या से संबंधित हैं वे नहीं रहेंगे, तो क्या साठ के बाद संत बनोगे... मुझे तम्हारे भविष्य की चिंता है...’

काउन्टर साहब के माथे पर थोड़ा सिकुड़नें उग आई, थोड़ा होंठ सूखे, पर नकली गंभीरता से उसने उसे रूआब में बताया...

ये मूर्खतापूर्ण सवाल हैं... मैं वर्तमान में जीता हूं, सपनों में नहीं , तुम्हें भी

समझाऊंगा कि सपना देखना बंद कर दो, दुनिया नहीं बदलने वाली... यह ऐसे ही चलती है...’

उसने काउंटर साहब का दर्शन सुनकर उसें झिड़का... ‘क्या बकते हो, सपना मैं नहीं तुम देखते हो, अपने बच्चे का , घर का ... देखो मैं ऊब चुका हूं तुमसे बातंे कर, लगता है तम्हारे पास समय का अभाव नहीं, जो करना हो जल्दी करो... पीठ में काफी दर्द हो रहा है, मैं कुछ बताने से रहा, यातनागृह में डालना चाहते हो तो वहीं डाल दो... चमड़ी उतारो चाहे नाखून कुछ फर्क नहीं लेकिन वह करना जो तुम्हारी पुलिस ने बैजू के साथ किया था....

काउंटर साहब ने उसे रोककर पूछा... क्या हुआ था बैजू के साथ...?

मैं नहीं बता सकता, कोई भी नहीं बता सकता... तुम तो दरोगा हो, समझ सकते हो कि पुरूष के साथ ऐसा क्या किया जा सकता है जिसे वह बता नहीं सकता..उसने काउंटर साहब को बताया...

काउंटर साहब ने उंगलियां मोड़ी , घुमावदार घेरा बनाया फिर उसमें दूसरे हाथ की उंगली डाल दी, यही ... उसने उससे सगर्व पूछा... जैसे वह पहेली बूझने का विशेषज्ञ हो...

उसने सिर हिलाया फिर काउंटर साहब ने अपनी नैतिकता का बखान किया... मैं गंदी चीजों, तरीकों के सहारे अपराधियों से नही निपटता ... उनसे कबूलवाने के कई रास्ते हैं... उन्हें आजमाता हूं... यदि तुम्हारा रिमांड मिल गया फिर देखना...

बंधे हुए ही उसने गर्दन सीधी की , पांवों को झटका, हाथ को आजमाया कहीं शून्य तो नहीं हुए, उसे लगा कि वह ठीक-ठाक है फिर उसने काउंटर साहब से पूछा...

आखिर क्या करोगे ? कुछ तो बताओ, मुझे मानसिक तैयारी में सुविधा होगी,’

मैं भी चाहता हूं कि सुविधापूर्ण तरीके से तुम संगठन के बारे में बताओ, अपने साथियों के नाम पते भी बताओ....

लेकिन कैसे, बीच में उसेने टोका...

काउंटर साहब के होंठ खुले, उस पर हंसी नाची , जो भद्दी थी...‘कैसेबहुत आसान है कामरेड! लेकिन है बहुत सटीक, अब कुछ इस तरह समझो, ‘मान लो हम और तुम एक आलीशान मकान के आलीशान कमरे में हैं, आलीशान मकान, आलीशान कमरा तथा आलीशान चीजें जो उस कमरे में होंगी उसके बारे में तुम्हारी क्या जानकारी है, मैं नहीं जान सकता लेकिन मैं वीवीआईपी ड्युटी करते-करते बहुत कुछ सीख जान चुका हूं, जब पहली बार पाकिस्तानी राष्ट्रपति मुशर्रफ का भारत आना हुआ था, मुझे मौका मिला था... एसपी तथा आईजी साहब के साथ मैं भी उस होटल में

आता जाता था तथा उस कमरे में भी जिसमें उन्हें सोना थाः उन कमरों मेंभी जहां खाना था... जहां वीवीआईपीओ से मिलना मिलाना था... मैं ही तो कमरों की सारी चीजों को ठोकता ठाकता था, तथा उन्हें पारंपरिक स्थानों से हटाकर दूसरी जगह पर रखता था....

काउंटर साहब को जैसे कुछ याद आया हो वह चौंका...फिर बोला....

भला कैसे भूल सकता हूं कि एसपी ने अपनी स्टिक से मुझे मारा था..जब  इधर उधर हटाने में एक आदमक्रद शीशा फर्श पर गिर कर टुकड़ा बन गया था...एसपी ने अनुमान लगाया था कि पचास हजार से ऊपर का रहा होगा... कहीं उनमें विस्फोटक वगैरह तो नहीं!

तुम कहानी सुनाने लगे...‘उसने काउंटर साहब को विषयांतरित होने पर टोका.... उसके टोकने के बाद काउंटर साहबकैसेवाले सवाल पर गया .....

तो कामरेड! तुम मान लो कि एक आलीशान कमरे में हो, उसमें आलीशान चीजें हैं एक से एक कीमती खूबसूरत... रात के ग्यारह बजने वाले हैं , तुम्हें झपकियां रही हैं, कुछ सेकेंड के लिए तुम्हारी आंखें बंद हो जाती हैं तुम कमरे में अकेले हो, ऐसे में कोई वर्दी वाला बिना वर्दी के आएगा, तुमसे गहन दोस्ताना अंदाज में पूछेगा... तुम्हें जगाते हुए... ‘ क्यों कामरेड नींद रही है क्या?’ इस तरह एक दो बार नहीं जाने कितनी बार... यह तो एक बानगी है....कुछ ऐसे कि तुम नींद में जा सको...

संक्षेप में बताऊं... तुम्हारी आंखें पानी देखेंगी, प्यास महसूसोगे तुम , पर पानी नहीं मिलेगा... इसी तरह खाना भी तथा देह ! वह तो तुममें इतना गहरे तक जाएगी कि तुम सत्तो को देखोगे, नाचते, गाते, आलिंगनबद्ध होते, किसी दूसरे के साथ नहीं, खुद अपने साथ पर सत्तो तक तुम पहुंच पाओगे... वैसे भी सत्तो ... मारी जा चुकी है....

बस, बस, बस...बस करो मुझ पर रहम करो, मुझे गोली मार दो... सारा कुछ समझ गया कि तुम मुझसे, नींद, भूख, प्यास यहां तक कि सोचने की शक्ति भी छीन लोगे.... मैं जीवित रहूंगा पर लाश की तरह यही ... फिर भी तुम मुझसे संगठन के बारे में कुछ भी कहलवा सकोगे... ठीक चौदहवें दिन तुम्हारा रिमांड खत्म हो जाएगा तथा अदालत मुझे जेल भिजवा देगी... क्योंकि अदालतें नक्सल पंथियों की जमानतें करती नहीं... चलो ठीक है....

तो फिर ले चलो यातनागृह की तरफ, थोडा़ जल्दी करो, जंगल जागने वाला है, जागे हुए जंगल में से तुम्हारा निकलना मुश्किल होगा... मैं तो बेमतलब का परेशान था.. अब समझा...बहुत-बहुत धन्यवाद मि. काउंटर !

काउंटर साहब उसके चेहरे की प्रतिक्रिया देखने में था, वहां शांति थी, तथा अदभुत आश्वस्ति... ऐसा तजबीज कर काउंटर साहब चकरा गया, साश्चर्य पूछा...

मि. कामरेड, काहे का धन्यवाद

इतना भी नहीं समझे, धन्यवाद इसलिए कि तुम्हारी वजह से मैं यातनागृह में होऊंगा.... जहां मेरे साथियों की सांसे हैं, गंध हैं... जीवित दिलों की धड़कने हैं...

फिर जाने क्या हुआ कि काउंटर साहब ने रायफल की नाल सीधी किया... धांय...धांय....धांय.. जंगल कांप उठा, पेड़ हिल गए, पत्ते डारों से चिपके हुए कांपने लगे...

यह अंधेरे की दूसरी परंपरा वाली भाषा थी... जिसका कोई अर्थ नहीं....


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

shivendra

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