दूसरी परंपरा story collection
dusari parampra दूसरी परंपरा काली रात , हर ओर सांय - सांय , बादलों की तड़क - गरज भी नहीं , कुछ भी दिख नहीं रहा , भयानक अंधेरा - अंधेरा भी बोलता , बतियाता , गुदगुदाता , अब उसे अंधेरे की गुदगुदियों से कुछ लेना - देना नहीं , पहले की बात दूसरी थी ........ वे पढ़ाई के दिन थे , पिता जीवित थे , घर पहुंचते ही पिता के सवाल उसकी खोपड़ी झनझना देते थे , ‘ इतनी रात तक कहां थे ? पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे रहे ?’ पहले तो नहीं , पर बाद में उसे विश्वसनीय झूठ बोलने की आदत पड़ गई थी , बाद में पिता ने तो पूछना ही बंद कर दिया था ... शायद वे समझने लगे ...